इतिहास जानने के स्रोत (Sources of History)
इतिहास जानने के स्रोत
इतिहास, बीते हुए समय और उस उस समय के लोगों को समझने और जानने का एक साधन है।
इतिहास हमें मानव की संस्कृति उनके धर्म और उनकी सामाजिक व्यवस्था को जानने और समझने में सहायता करता है।
इतिहास का अध्ययन अतीत से वर्तमान और भविष्य के लिए सबक लेना सिखाता है।
इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि हम उन बातों का अनुसरण कैसे करें जिनमें समरसता और शांति को बढ़ावा मिल सके।
इतिहासकारो ने अतीत को तीन भागों में बाँटा है:
पूर्व (प्राक्) ऐतिहासिक काल:
उस समय जिसके लिए कोई भी लिखित सामग्री उपलब्ध नहीं है।
आद्य ऐतिहासिक काल:
वह समय जिससे सम्बन्धित लिखित साक्ष्य तो है, किंतु उसे पढ़ा नहीं जा सकता है।
ऐतिहासिक काल:
जिस काल के समय लिखित सामग्री से जानकारी मिलती है एवं उसे पढ़ा भी जा सकता है।
प्राचीन काल के जो लोग लिखना नहीं जानते थे उन लोगों के जीवन के विषय में हमें जानकारी उनके द्वारा छोड़ी गई वस्तुओं जैसे मिट्टी के बर्तन, खिलौने, हथियारों और औजारों द्वारा मिलती है। प्रायः इन वस्तुओं को पुरातत्ववेत्ता जमीन के अंदर से खोदकर प्राप्त करते हैं। यह वस्तुएं ऐतिहासिक जानकारी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं।
पुरातत्व:
प्राचीन काल में मानव द्वारा प्रयोग में लाई वस्तुओं, निर्मित मंदिरों एवं इमारतों आदि के अवशेषों का अध्ययन पुरातत्व कहलाता है और इन अवशेषों का अध्ययन करने वाले पुरातत्ववेत्ता कहलाते हैं।
पुरातत्ववेत्ता:
सावधानी से जमीन की देख-रेख और समझ के आधार पर खुदाई कराते हैं। खुदाई से प्राप्त छोटी वस्तुओं से वे लिखित दस्तावेज तैयार करते हैं। इन्हीं वस्तुओं के आधार पर हमें अतीत की जानकारी प्राप्त होती है।
मानव ने जब लिखना शुरू किया तब उसे कागज का ज्ञान नहीं था वह अपने लेखों को निम्न तरीकों से लिखता था:
ताड़पत्र: ताड़ के पेड़ के चौड़े पत्ते
भोजपत्र: भूर्ज नामक पेड़ की छाल
ताम्रपत्र: तांबे के पतले एवं चपटे टुकड़े
स्तंभलेख: पत्थर के खंभों पर लिखे लेख पत्र
शिलालेख: पत्थर की चट्टानों पर लिखे लेख
आधुनिक इतिहास के विषय में हमें जानकारी तत्कालीन लेखों से प्राप्त होती है।
पुरातात्विक और साहित्यिक दोनों स्रोतों से हमे इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है। इतिहास को जानने के स्रोत (साधन) इस प्रकार हैं:
पुरातात्विक स्रोत―
अभिलेख: अभिलेख पत्थर अथवा धातु जैसी कठोर सतह पर उत्कीर्ण किये गए लेख होते थे।
अभिलेखों से उस समय के राजा का नाम, उसकी नीति-कानून, शासन-काल, लिपि, भाषा, साम्राज्य विस्तार, सभ्यता-संस्कृति आदि के विषय में पता चलता है।
यह अशोक के रुम्मिनदेई अभिलेख का अंश है। जो लुंबिनी (नेपाल) से प्राप्त हुआ है। इस पत्थर के अभिलेख में अशोक ने यह घोषणा की है कि लुंबिनी में उपज का आठवां भाग कर के रूप में लिया जाएगा। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में लिखा गया था।
सिक्के एवं मुहरें: सिक्कों से तत्कालीन शासक का नाम, उसका समय;
सिक्के की बनावट से उस समय की कला तथा
सिक्के की धातु से आर्थिक स्थिति की जानकारी प्राप्त होती है।
उपर्युक्त सिक्के पर गुप्तशासक कुमारगुप्त प्रथम को घुड़सवारी करते हुए दिखाया गया है। जिससे हम कह सकते हैं कि वह एक अच्छे घुड़सवार थे। इस प्रकार सिक्के इतिहास लेखन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
हड़प्पा कालीन मोहरे मेसोपोटामिया से मिली है इससे ज्ञात होता है कि हड़प्पावासियों का व्यापार मेसोपोटामिया से होता था।
पुरास्थल: वह स्थान जहां की खुदाई से औजार, बर्तन और इमारतों के अवशेष मिलते हैं। प्रायः पुरास्थल जल स्रोतों जैसे नदी, तालाब, झील व समुद्र के किनारे पाए जाते हैं।
धौलावीरा: हड़प्पा सभ्यता का यह पुरास्थल गुजरात में स्थित है यहां से हड़प्पा कालीन नगर निर्माण योजना जल निकास प्रबंधन आदि के साक्ष्य प्राप्त हुए।
स्तूप: स्तूप का शाब्दिक अर्थ है– टीला। प्रायः सभी स्तूपों के अंदर एक डिब्बे में महात्मा बुद्ध या उनके अनुयायियों के शरीर के अवशेष (जैसे– दाँत, हड्डी, राख) या उनके द्वारा प्रयोग में लायी सामग्री, पत्थर अथवा सिक्के रखे रहते हैं।
सारनाथ स्तूप: सारनाथ (उत्तर प्रदेश) में स्थित स्तूप (धमेख स्तूप) का निर्माण मौर्य वंश के शासक अशोक ने कराया था महात्मा बुद्ध ने सर्वप्रथम सारनाथ में अपना उपदेश दिया था।
साहित्यिक स्रोत―
ताड़पत्रों, भोजपत्रो, ताम्रपत्रों, चमड़े एवं लकड़ी के पट्टों पर लिखित लेखो के साथ-साथ कुछ साहित्यिक ग्रंथों से भी हमें लोगों के रहन-सहन, विचारों, खान-पान इत्यादि के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। जैसे–
इतिहासकार अतीत से प्राप्त तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर बीते समय की जानकारी देते हैं।
इतिहासकार इन्ही स्रोतों से अतीत की कृषि, पशुपालन, कामगार/शिल्प, काम-धन्धे, व्यापार, नाप-तौल, लेन-देन, कर आदि के आधार पर आर्थिक स्थिति का वर्णन करते हैं।
घर परिवार, स्त्रियों की स्थिति, शिक्षा, रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, मनोरंजन, त्योहार, मेले आदि के आधार पर सामाजिक स्थिति का वर्णन करते हैं।
राजा, प्रजा, प्रशासन, सुरक्षा व सैन्य व्यवस्था के आधार पर राजनीतिक स्थिति की जानकारी प्रदान करते हैं।
कला, आचार विचार, ज्ञान विज्ञान की मान्यताएं, धार्मिक विश्वास, देवी देवता, पूजा पाठ एवं परम्पराओं के आधार पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का वर्णन करते हैं।
कौन पहले कौन बाद में:
जब पुरातत्वविद किसी स्थान की खुदाई करते हैं तो वे कैसे समझते हैं कि कौन से स्तर पहले के हैं और कौन बाद के
किसी भी पुरास्थल में कई बस्तियों के अवशेष मिल सकते हैं।
जब किसी टीले की खुदाई की जाती है तो उसका सबसे निचला स्तर सबसे पुराना होता है और उसके बाद के स्तर बाद के युगों के होते हैं।
इतिहास में तिथियाँ:
ईसा पूर्व– ईसा पूर्व का तात्पर्य है ईसा मसीह के जन्म से पहले का समय। इसे अंग्रेजी में B.C. अर्थात बिफोर क्राइस्ट लिखते हैं।
ईस्वी– ईस्वी का तात्पर्य ईसा मसीह के जन्म के बाद का समय है। इसे अंग्रेजी में A.D. अर्थात एनो डोमिनी कहते हैं।
A.D. का मतलब है ईसा मसीह के जन्म का वर्ष। अर्थात ईसा मसीह के जन्म के बाद की तिथियों में हम ईस्वी या A.D. का प्रयोग करते हैं।
कभी-कभी A.D. की जगह C.E. (कॉमन एरा) तथा B.C. की जगह B.C.E. (बिफोर कॉमन एरा) का प्रयोग होता है।
महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है।
लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम विश्व का सबसे बड़ा संग्रहालय है।
अलेक्जेंडर कनिंघम को भारतीय पुरातत्व विभाग का जन्मदाता माना जाता है।
संग्रहालय– ऐतिहासिक वस्तुओं को सुरक्षित रखने का स्थान
धर्मेत्तर साहित्य– धार्मिक साहित्य से भिन्न साहित्यिक ग्रंथ
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