संसाधन और विकास (Resources and Development) Class 10 Geography Chapter 01 Notes in Hindi
Ch.1 संसाधन एवं विकास (Resource and Development)
संसाधन (Resource) :
संसाधन वो चीजें होती हैं जो हमें अपने जीवन में काम आती हैं, जैसे पानी, हवा, मिट्टी, लकड़ी, लोहा आदि। जब हम इन चीजों का सही इस्तेमाल करना जानते हैं और उन्हें उपयोगी बनाने की तकनीक भी हमारे पास होती है, और वो चीजें हमारे समाज में स्वीकार भी होती हैं, तब हम उन्हें संसाधन कहते हैं।
संसाधनों का वर्गीकरण (Types of Resources) :
उत्पत्ति के आधार पर – जैव और अजैव
समाप्यता के आधार पर – नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
स्वामित्व के आधार पर – व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
विकास के स्तर के आधार पर – संभावी, संभावी विकसित भंडार और संचित कोष
संसाधनों का विकास और समस्याएं (Development of resources and Problems):
संसाधन मानव जीवन के लिए आवश्यक हैं, लेकिन इनके अंधाधुंध दोहन से कई समस्याएँ पैदा हुई हैं:
- कुछ लोगों द्वारा संसाधनों का अत्यधिक दोहन।
- संसाधनों का समाज के कुछ ही लोगों के हाथों में केंद्रित होना, जिससे समाज अमीर-गरीब में बँट गया।
- संसाधनों के अंधाधुंध शोषण से वैश्विक पारिस्थितिकी संकट पैदा हो गया है जैसे; भूमंडलीय तापन (Global Warming), ओजोन परत का क्षरण, पर्यावरण प्रदूषण और भूमि निम्नीकरण आदि।
मानव जीवन की गुणवत्ता और वैश्विक शांति के लिए समाज में संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण और सतत विकास आवश्यक है।
सतत् पोषणीय विकास (Sustainable development):
संसाधनों का इस तरह से प्रयोग किया जाए ताकि वर्तमान पीढ़ी के साथ साथ भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएं भी पूरी होती रहें, सतत् पोषणीय विकास कहलाता है।
रियो डी जनेरियो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 :
1992 में ब्राज़ील के रियो डी जनेरियो शहर में पहला अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 100 से अधिक देशों के नेताओं ने भाग लिया और निम्नलिखित समझौतों पर हस्ताक्षर किए:
- जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता पर समझौता।
- वन सिद्धांत (Forest Principles) को मान्यता दी गई।
- एजेंडा 21 को स्वीकार किया गया, जो 21वीं सदी में सतत विकास के लिए एक कार्ययोजना है।
एजेंडा 21 :
यह एक वैश्विक कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, गरीबी उन्मूलन और बीमारियों से मुक्ति के लिए सामूहिक प्रयास करना है। इसके अनुसार, प्रत्येक स्थानीय संस्था को अपना स्थानीय एजेंडा 21 बनाना चाहिए।
संसाधन नियोजन (Resource Planning):
ऐसे उपाय अथवा तकनीक जिसके द्वारा संसाधनों का उचित उपयोग सुनिश्चित किया जा सकता है, संसाधन नियोजन कहलाता है।
भारत में संसाधन नियोजन (Resource Planning in India):
भारत में संसाधन नियोजन की प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण शामिल हैं:
- संसाधनों की पहचान और मानचित्रण करना।
- उचित प्रौद्योगिकी और संस्थागत ढाँचे का विकास करना।
- संसाधन विकास योजनाओं को राष्ट्रीय विकास योजनाओं के साथ जोड़ना।
स्वतंत्रता के बाद, भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से संसाधन नियोजन पर जोर दिया।
संसाधन संरक्षण (Resource Conservation) :
- संसाधन संरक्षण का अर्थ है — प्राकृतिक संसाधनों (जैसे जल, वायु, मृदा, खनिज, वन, जीव-जंतु आदि) का इस तरह उपयोग करना कि वे नष्ट न हों और भविष्य की पीढ़ियाँ भी उनका लाभ उठा सकें।
- महात्मा गांधी ने कहा था: "प्रकृति हर किसी की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को नहीं।"
- 1968 में रोम क्लब ने संसाधन संरक्षण पर चर्चा शुरू की।
- 1987 में ब्रुंटलैंड रिपोर्ट ने "सतत विकास" की अवधारणा प्रस्तुत की।
- 1992 में रियो सम्मेलन ने एजेंडा 21 को अपनाया।
भू-संसाधन (Land Resources):
- भूमि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।
- प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक क्रियाएँ, परिवहन तथा संचार व्यवस्थाएं भूमि पर ही आधारित हैं।
- भूमि एक सीमित संसाधन हैं इसलिए हमें इसका उपयोग सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से करना चाहिए।
भारत में भूमि संसाधन (Land Resources in India) :
- लगभग 43% प्रतिशत भू-क्षेत्र मैदान हैं जो कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक हैं।
- लगभग 30% प्रतिशत भू-क्षेत्र पर विस्तृत रूप से पर्वत स्थित हैं जो बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते हैं, पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है।
- लगभग 27% प्रतिशत हिस्सा पठारी क्षेत्र है जिसमें खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है।
भू-उपयोग (Land Utilisation):
भौगोलिक प्रक्रिया जिसके अनुसार भूमि का प्रयोग विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए किया जाता है।
भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्व हैं:–
वन (Forests):- पेड़ों से आच्छादित एक विशाल क्षेत्र।
कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि (Land not available for cultivation):-
- बंजर तथा कृषि अयोग्य भूमि (Barren and wasteland),
- गैर कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि (Land put to non-agricultural uses) – इमारतें, सड़कें, उद्योग।
परती भूमि (Fallow lands):-
वर्तमान परती- जहां एक वर्ष या उससे कम समय से खेती ना की गई हो।
अन्य परती- जहां 1-5 वर्ष से खेती न की गई हो।
अन्य कृषि अयोग्य भूमि (Other uncultivated lands):- स्थाई चरागाहें तथा अन्य भूमि विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों तथा उपवन के अधीन भूमि। कृषि योग्य बंजर भूमि जो 5 वर्ष या अधिक से खाली हो।
शुद्ध बोया गया क्षेत्र (Net sown area):- एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध बोया गया क्षेत्र कहते हैं।
भारत में भू-उपयोग प्रारूप के प्रकार (Land Use Pattern in India):
भू-उपयोग को निर्धारित करने वाले तत्त्वों में
भौतिक कारक (Physical factors) जैसे; भू-आकृति, मृदा, जलवायु और तथा
मानवीय कारक (Human factors) जैसे; जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिक क्षमता, संस्कृति और परंपराएँ इत्यादि शामिल हैं।
भू-निम्नीकरण के कारण (Reasons of Land Degradation) :
- वनोन्मूलन (Deforestation)
- खनन (Mining)
- अतिचारण (महाराष्ट्र) (Overgrazing)
- अतिसिंचाई (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश)
- औद्योगिक प्रदूषण (Industrial Pollution)
भूमि संरक्षण के उपाय (Land Conservation Measures) :
- वनरोपण (Afforestation)
- पौधों का रक्षक मेखला (Shelterbelts) के रूप में रोपण।
- अत्यधिक चराई (Overgrazing) पर नियंत्रण।
- कटीली झाड़ियों (Thorny Bushes) को उगाकर रेत के टीलों (Sand Dunes) को स्थिर करना शुष्क क्षेत्रों में भूमि क्षरण को रोकने का एक तरीका है।
- बंजर भूमि (Waste Land) का उचित प्रबंधन।
- खनन गतिविधियों (Mining Activities) पर नियंत्रण।
- औद्योगिक अपशिष्टों (Industrial effluents) का उचित निर्वहन और निपटान (Proper discharge and disposal)
मृदा संसाधन (Soil as a Resource):
मृदा एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। मिट्टी में ही खेती होती है। मिट्टी कई जीवों का प्राकृतिक आवास भी है।
मृदा का निर्माण (Soil Formation) :
- मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मात्र एक सेंटीमीटर मृदा को बनने में हजारों वर्ष लग जाते हैं।
- मृदा का निर्माण शैलों के अपघटन क्रिया से होता है। मृदा के निर्माण में कई प्राकृतिक कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जैसे; कि तापमान, पानी का बहाव, पवन।
- इस प्रक्रिया में कई भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों का भी योगदान होता है।
मृदा के प्रकार (Classification of Soils):
- जलोढ़ मृदा
- काली मृदा
- लाल एवं पीली मृदा
- लेटराइट मृदा
- मरूस्थलीय मृदा
- वन मृदा
जलोढ़ मृदा (Alluvial Soils):
- भारत का उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से ही बना है। यह भारत की सबसे महत्वपूर्ण मृदा है।
- इस मिट्टी में पोटाश, फास्फोरस और चूना प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
- उत्तरी मैदान में ये मृदा सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों द्वारा विकसित होती है।
- एक सकरी पट्टी के रूप में यह मृदा राजस्थान और गुजरात तक फैली है।
- पूर्वी तटीय मैदान, विशेषकर महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा भी जलोढ़ मृदा से बने हैं।
- आयु के आधार पर पुरानी जलोढ़ (बांगर) एवं नयी जलोढ़ (खादर) मृदा में वर्गीकृत किया जाता है।
- बांगर मृदा में 'कंकड़' की मात्रा ज्यादा होती है। खादर मृदा में बांगर मृदा की तुलना में ज्यादा महीन कण पाए जाते हैं।
- यह मृदा बहुत उपजाऊ होती है, जो इसे गन्ना, चावल, गेहूँ, अनाज व दलहनी आदि फसलों की खेती के लिए उपयुक्त बनाता है।
- जलोढ़ मृदा के क्षेत्र में सघन कृषि की जाती है और यहां जनसंख्या घनत्व भी अधिक है।
खादर एवं बांगर में अंतर :
खादर –
- नवीन जलोढ़ मृदा
- अधिक उपजाऊ मृदा
- अधिक बारीक व रेतीली
- नदी के पास डेल्टा तथा बाढ़ निर्मित मैदानों में पाई जाती है।
बांगर –
- प्राचीन जलोढ़ मृदा।
- कम उपजाऊ मृदा
- कंकण व कैल्शियम कार्बोनेट
- नदी से दूर ऊँचे स्तर पर पाई जाती है।
काली मृदा (Black Soil):
- इसका रंग काला होता है।
- इसे रेगर मृदा (Regur Soil) के नाम से भी जाना जाता है।
- काली मृदा कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है।
- बेसाल्ट चट्टानों के टूटने फूटने के कारण काली मृदा का निर्माण होता है।
- काली मृदा बहुत महीन कणों अर्थात् मृत्तिका से बनी है।
- इसकी नमी धारण करने की क्षमता बहुत होती है।
- इसमें कैल्शियम कार्बोनेट, मैगनीशियम, पोटाश और चूने की बहुलता पाई जाती है।
- लेकिन इनमें फास्फोरस की मात्रा कम होती है।
- गर्म और शुष्क मौसम में इन मृदाओं में गहरी दरारें पड़ जाती हैं जिससे इनमें अच्छी तरह वायु मिश्रण हो जाता है।
- गीली होने पर ये मृदाएँ चिपचिपी हो जाती है और इन को जोतना मुश्किल होता है।
- महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के पठारों में पाई जाती है।
- कपास के अलावा गेहूं, ज्वार, बाजरा और तिलहन जैसी फसले भी उगाई जाती हैं।
लाल एवं पीली मृदा (Red and Yellow Soil) :
- यह मृदा कम वर्षा वाले क्षेत्रों में आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों पर विकसित हुई है।
- लाल रंग का कारण इसमें लौह ऑक्साइड (आयरन ऑक्साइड) का अधिक मात्रा में पाया जाना है।
- पीला रंग इसमें जलयोजन (हाइड्रेशन) की प्रक्रिया के कारण होता है
- यह अम्लीय प्रकृति की मिट्टी होती है।
- इसमें कम उर्वरता होती है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और जैविक पदार्थ की कमी होती है।
- उड़ीसा, छत्तीसगढ़, मध्य गंगा के मैदान के दक्षिणी छोर व पश्चिमी घाट के पहाड़ी पद पर पाई जाती है।
लेटराइट मृदा (Laterite Soil) :
- लेटराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द लेटर (Later) से लिया गया है। जिसका अर्थ होता है- ईंट।
- लेटराइट मृदा उच्च तापमान और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होती है।
- भारी वर्षा से अत्यधिक निक्षालन (leaching) के परिणामस्वरूप इनका निर्माण होता है।
- यह मृदा अधिकतर गहरी और अम्लीय होती है।
- इस मृदा में मृदा अपरदन और भूमि निम्नीकरण की संभावना अधिक होती है।
- लेटराइट मृदा चाय, काफी व काजू की फसल के लिए उपयुक्त होती है।
- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती है।
मरूस्थलीय मृदा (Arid Soils):
- इसका रंग लाल व भूरा पाया जाता है।
- रेतीली तथा लवणीय (Sandy and Saline) होती है।
- शुष्क जलवायु तथा उच्च तापमान के कारण जल वाष्पन की दर अधिक होती है।
- ह्यूमस और नमी (moisture) की मात्रा कम।
- उचित सिंचाई प्रबंधन के द्वारा उपजाऊ बनाया जा सकता है।
वन मृदा (Forest Soils) :
- पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
- इस मृदा के निर्माण में पर्वतीय पर्यावरण के अनुसार बदलाव होता रहता है।
- नदी घाटियों में मृदा दोमट तथा सिल्टदार होती है।
- वन मृदा अम्लीय तथा ह्यूमस रहित होती है।
मृदा अपरदन (Soil Erosion):
मृदा अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें हवा, पानी या अन्य प्राकृतिक कारकों द्वारा मिट्टी की ऊपरी परत का कटाव और बहाव होता है।
मृदा अपरदन के कारण (Reasons of Soil Erosion):
- वनोन्मूलन (deforestation)
- अत्यधिक पशु चारण (overgrazing)
- निर्माण व खनन प्रक्रिया (construction and mining)
- प्राकृतिक तत्व जैसे, झरने, ग्लेशियर और पानी।
- कृषि के गलत तरीके (defective methods of farming) (जुताई के तरीके)।
- पवन द्वारा मैदान अथवा ढालू क्षेत्र में मृदा को उड़ा ले जाना।
मृदा अपरदन के प्रकार:
(A) जल द्वारा अपरदन:
अवनालिकाएँ (Downpipes): बहता हुआ जल मृत्तिकायुक्त मृदाओं को काटते हुए गहरी वाहिकाएं बनाता है, जिन्हें अवनालिकाएँ कहते हैं।
खड्ड भूमि (Ravine): नालियाँ गहरी होकर "खड्ड" (Ravines) बन जाती हैं (जैसे चंबल बेसिन में)।
चादर अपरदन (Sheet Erosion): ढालों पर पानी मिट्टी की पतली परत को समतल रूप से बहा ले जाता है।
(B) पवन अपरदन (Wind Erosion) :
धूल भरी आँधियाँ मैदान और ढालू क्षेत्र से मिट्टी के बारीक कणों को उड़ा ले जाती हैं।
(C) मानवजनित कारण:
गलत खेती पद्धतियाँ: जैसे ढलान के साथ हल चलाना।
वनों की कटाई और अतिचराई से मिट्टी ढीली होकर बह जाती है।
मृदा संरक्षण के उपाय:
(A) कृषि पद्धतियाँ:
समोच्च जुताई (Contour Ploughing): ढलान के समानांतर हल चलाकर पानी के बहाव को रोकना।
सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming): पहाड़ियों पर सीढ़ियाँ (सोपान) बनाकर खेती की जाती है। पश्चिमी और मध्य हिमालय में सोपान अथवा सीढ़ीदार कृषि काफी विकसित है।
पट्टीदार खेती (Strip Farming): इसमें खेत को अलग-अलग फसलों की पट्टियों (strips) में बाँटा जाता है और हर पट्टी में अलग-अलग फसलें और फसलों के बीच में घास उगाई जाती हैं। यह विधि खासकर ढलान वाली या मिट्टी कटाव वाले क्षेत्रों में उपयोगी होती है।
(B) वानिकी एवं वृक्षारोपण:
रक्षक मेखला (Shelterbelts): पेड़ों की कतारें लगाकर हवा की गति कम करना। जैसे यह भारत के पश्चिमी भाग में राजस्थान के थार मरुस्थल के किनारे रेत के टीलों का अपरदन रोकने में सहायक है।
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