संसाधन के रूप में लोग Class 9 SST Economics Chapter 02 notes (People as Resource)

Ch.02 संसाधन के रूप में लोग (People as Resource)


संसाधन के रूप में लोग:

  • संसाधन के रूप में लोगों से तात्पर्य किसी देश के कार्यशील जनसंख्या (15-59 वर्ष) की उत्पादक क्षमताओं से है। यह देश के आर्थिक विकास में योगदान देता है।


मानव संसाधन (Human Resource):

  • किसी देश की जनसंख्या भी एक संसाधन है : एक मानव संसाधन।

  • मानव संसाधन अन्य संसाधनों से श्रेष्ठ है, जैसे; भूमि, पूँजी इत्यादि। क्योंकि ये संसाधन स्वयं अपना उपयोग नहीं कर सकते।

  • जापान में मानव संसाधन पर अधिक निवेश किया गया है।


मानव पूंजी (Human Capital):

  • जब लोगों के शिक्षा, प्रशिक्षण और चिकित्सा सेवाओं में निवेश किया जाता है तो जनसंख्या मानव पूंजी में बदल जाती है।

  • मानव पूंजी देश की उत्पादन शक्ति में वृद्धि करता है।

  • भौतिक पूंजी पर लगने वाले श्रम को मानव पूंजी कहते हैं।

  • उदाहरण: जापान में प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, लेकिन वहाँ की शिक्षा प्रणाली और कौशल विकास पर जोर देने के कारण वहाँ के लोग देश की प्रमुख ताकत बन गए हैं।




अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of Economy):

  • अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्रियाकलापों को तीन प्रमुख क्षेत्रकों में बाँटा गया है— प्राथमिक, द्वितीय और तृतीयक।


  • प्राथमिक क्षेत्रक: 

  • प्राकृतिक संसाधनों (भूमि और जल) पर आधारित गतिविधियाँ।

  • उदाहरण:

    • कृषि

    • वानिकी

    • पशुपालन

    • मत्स्य पालन

    • मुर्गी पालन

    • खनन्


  • द्वितीयक क्षेत्रक:

  • प्राथमिक क्षेत्रक की वस्तुओं को अन्य रूपों में परिवर्तित करना।

  • उद्योग एवं विनिर्माण क्रियाएँ, बिजली संयंत्र।

  • उदाहरण:

    • गन्ने से चीनी बनाना

    • कपास से कपड़े बनाना


  • तृतीयक क्षेत्र:

  • इसे सेवा क्षेत्र भी कहा जाता है।

  • प्राथमिक और द्वितीय क्षेत्रक के विकास में सहायता करता है।

  • यह स्वयं उत्पादन नहीं करता बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में सहयोग करता है।

  • उदाहरण:

    • व्यापार

    • बैंकिंग

    • बीमा

    • परिवहन और संचार 

    • शिक्षा


आर्थिक क्रियाएँ (Economic activities):

  • वह सभी क्रियाएँ जो राष्ट्रीय आय में मूल्यवर्धन करती हैं आर्थिक क्रियाएँ कहलाती है।

  • आर्थिक क्रियाओं के प्रकार :- आर्थिक क्रियाएँ दो प्रकार की है —

    • बाजार क्रियाएँ

    • गैर बाजार क्रियाएँ

  • बाजार क्रियाएँ (Market activities): इसमें वेतन या लाभ के उद्देश्य से की गई क्रियाओं के लिए पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। इनमें सरकारी सेवा सहित वस्तुओं या सेवाओं का उत्पादन शामिल है।

  • उदाहरण: कारखाने में काम करना, दुकान चलाना।

  • गैर-बाजार क्रियाएँ (Non-Market activities): ये स्व-उपभोग के लिए उत्पादन है।


महिलाओं की गतिविधियां:

  • महिलाएं आम तौर पर घरेलू मामलों की देखभाल करती हैं। लेकिन अगर उन्हें शिक्षा और रोजगार के अवसर दिए जाएं तो वे अर्थव्यवस्था में योगदान कर सकती हैं।


जनसंख्या की गुणवत्ता (Quality of Population):

  • जनसंख्या की गुणवत्ता तीन कारकों पर निर्भर करती है:  

  1. साक्षरता दर  

  2. स्वास्थ्य सुविधाएँ (जीवन प्रत्याशा, शिशु मृत्यु दर)।  

  3. कौशल विकास (व्यावसायिक प्रशिक्षण)।


शिक्षा का महत्व (Importance of education):

  • शिक्षा श्रम की गुणवत्ता बढ़ाती है। शिक्षा न केवल व्यक्तिगत विकास में बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि में भी मदद करती है।

  • सर्वशिक्षा अभियान :- प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य 06 से 14 वर्ष आयु वर्ग के सभी स्कूली बच्चों को वर्ष 2010 तक प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना था।

  • प्राथमिक शिक्षा में नामांकन बढ़ाने के लिये सरकार द्वारा ‘सेतु-पाठ्यक्रम’ और ‘स्कूल लौटो शिविर’ कार्यक्रमों का प्रारंभ किया गया।

  • भारत में साक्षरता दर :-

  • जनगणना 2011 के अनुसार भारत की कुल साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत हो गई है जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत तथा महिलाओं की साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत हो गई है।


मृत्यु दर (Mortality rate):

  • मृत्यु दर से अभिप्राय एक विशेष अवधि में प्रति एक हजार व्यक्तियों के पीछे मरने वाले लोगों की संख्या से है।


जन्मदर (Birth rate):

  • एक विशेष अवधि में प्रति एक हजार व्यक्तियों के पीछे जन्म लेने वाले शिशुओं की संख्या से है।


शिशु मृत्यु दर (Infant mortality rate):

  • किसी वर्ष में पैदा हुए 1000 जीवित बच्चों में से एक वर्ष की आयु से पहले मर जाने वाले बच्चों का अनुपात शिशु मृत्यु दर कहलाता है।


बेरोजगारी (Unemployment):

  • वह दशा या वह स्थिति है जब प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने के लिए इच्छुक व्यक्ति को रोजगार प्राप्त नहीं होता।

  • श्रम जनसंख्या में वे लोग शामिल किए जाते हैं, जिनकी उम्र 15 से 59 वर्ष के बीच है।

  • जब किसी देश की जनसंख्या में कार्य करने योग्य लोगों की संख्या ज्यादा होती है तो उसे जनांकिकीय लाभांश कहा जाता है।


बेरोज़गारी के प्रकार (Types of Unemployment):

  • मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment): 

  • जब लोग वर्ष के कुछ महीने में रोजगार प्राप्त नहीं करते है।

  • प्रछन्न बेरोज़गारी (Disguised Unemployment): 

  • जब चार व्यक्तियों का काम आठ व्यक्ति कर रहे हैं। प्रच्छन्न बेरोजगारी में व्यक्ति की उत्पादकता शून्य होती है। इसे अदृश्य बेरोजगारी या छिपी हुई बेरोजगारी भी कहा जाता है।

  • शिक्षित बेरोज़गारी : 

  • डिग्री होने के बावजूद युवक रोजगार पाने में असमर्थ हैं।


भारत में बेरोजगारी के कारण:

  • बढ़ती जनसंख्या।

  • कृषि क्षेत्र में विकास की धीमी गति।

  • औद्योगिक और सेवा क्षेत्रक सीमित है।

  • शिक्षा पद्धति व्यवहारिक नहीं है।

  • तकनीकी विकास अव्यवस्थित हैं।

  • ग्रामीण लोगों का शहरों की ओर प्रस्थान।


बेरोज़गारी से अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:

  • बेरोज़गारी में वृद्धि मंदीग्रस्त अर्थव्यवस्था का सूचक है। बेराजगारी में वृद्धि के कारण समाज के जीवन की गुणवत्ता का भी बुरा प्रभाव पड़ता है।


शिक्षित बेरोज़गारी भारत के लिये किस प्रकार एक चुनौती है?

  • प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्र में विकास की गुजांइश है। अधिकाशतः शिक्षित लोग तृतीयक सेवाओं की ओर आकर्षित होते हैं। जहाँ नौकरियाँ सीमित हैं। अतः शिक्षित युवक डिग्रियाँ होते हुए भी बेरोज़गार हैं। 

  • विदेशों में नौकरी पाने वाले इच्छुक युवकों के पास इतनी सुविधाएँ नहीं है कि वह विदेश जा सकें। अतः यह समस्या भारत के लिये जटिल होती जा रही है।


शिक्षित बेरोज़गारी का समाधान:

  • स्कूल और कालेजो में व्यवसायिक विषयों को पढ़ाने लिखने की व्यवस्था शुरू की जा सकती है ताकि वह अपना कोई काम शुरू कर सकें।

  • औद्योगिक प्रशिक्षक केन्द्र (आई.टी.आई.) खोले जाएँ ताकि पढ़े लिखे विद्यार्थियों को वहाँ किसी व्यवसाय संबंधी ट्रेनिंग दी जा सके। फिर वह चाहें नौकरी प्राप्त करे या न करें अपना काम खोल सकते हैं।


राष्ट्रीय नीति का लक्ष्य:

  • जनसंख्या के अल्प सुविधा प्राप्त वर्गों पर विशेष ध्यान देते हुए स्वास्थ्य सेवाओं, परिवार कल्याण और पौष्टिक सेवा तक इनकी पहुँच को बेहतर बनाना है।

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