संघवाद – Class 10 NCERT Civics Chapter 2 Notes & Question Answer
Chapter 02 – संघवाद (Federalism)
संघवाद क्या है?
संघवाद एक ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें दो स्तर की सरकारें होती हैं।
केंद्र सरकार (जो पूरे देश के लिए कानून बनाती है)।
राज्य सरकारें (जो अपने-अपने राज्य के लिए कानून बनाती हैं)।
दोनों सरकारें अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करती हैं।
संघीय शासन व्यवस्था की विशेषताएँ
इसमें सत्ता बाँटी हुई होती है – केंद्र और राज्यों में।
केंद्र सरकार देश के बड़े मुद्दों जैसे – रक्षा, विदेश नीति, संचार आदि पर काम करती है।
राज्य सरकारें स्थानीय मामलों जैसे – पुलिस, कृषि, सिंचाई आदि पर काम करती हैं।
संविधान में साफ-साफ लिखा गया है कि किस विषय पर किस स्तर की सरकार कानून बना सकती है।
अदालतें यह तय करती हैं कि संविधान और सरकारों के अधिकारों का पालन हो रहा है या नहीं।
मुख्य उद्देश्य – देश की एकता बनाए रखना और विविधताओं का सम्मान करना।
एकात्मक और संघात्मक सरकारों में अंतर
1. एकात्मक शासन व्यवस्था (Unitary Government)
इसमें केंद्र सरकार सबसे ज्यादा ताकतवर होती है।
संविधान में बदलाव (संशोधन) करने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को होता है।
सारी शक्तियाँ एक ही जगह यानी केंद्र सरकार के पास होती हैं।
नागरिकों की सिर्फ एक ही नागरिकता होती है (देश की, अलग-अलग राज्यों की नहीं)।
अगर राज्यों को कुछ शक्तियाँ दी भी गई हों, तो केंद्र चाहे तो उन्हें वापस ले सकता है।
उदाहरण: ब्रिटेन, फ्रांस।
2. संघात्मक शासन व्यवस्था (Federal Government)
इसमें केंद्र सरकार अकेली बहुत ताकतवर नहीं होती, बल्कि राज्यों की भी अच्छी-खासी शक्ति होती है।
संविधान में बदलाव करने के लिए केंद्र और राज्यों दोनों की सहमति जरूरी होती है।
शक्तियाँ कई स्तरों पर बाँटी जाती हैं – केंद्र, राज्य, और कभी-कभी स्थानीय स्तर।
कुछ देशों में नागरिकों की दोहरी नागरिकता होती है (जैसे – अमेरिका: देश की और राज्य की)।
केंद्र और राज्य सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र होती हैं।
उदाहरण: भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया।
संघवाद के प्रकार
साथ आकर संघ बनाना (Coming together federation)
अलग-अलग स्वतंत्र राज्य मिलकर एक संघ बनाते हैं।
सभी राज्यों की शक्ति बराबर होती है।
उदाहरण: अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड।
साथ लेकर संघ बनाना (Holding together federation)
एक बड़ा देश अपनी विविधताओं को ध्यान में रखकर राज्यों का गठन करता है।
केंद्र अधिक शक्तिशाली होता है।
उदाहरण: भारत, बेल्जियम, स्पेन।
भारत में संघीय व्यवस्था
आज़ादी के बाद भारत का गठन एक संघीय शासन व्यवस्था के रूप में हुआ।
संविधान ने दो स्तर की सरकार बनाई – केंद्र और राज्य।
बाद में तीसरा स्तर भी जोड़ा गया – स्थानीय सरकार (पंचायत और नगरपालिकाएँ)।
संविधान में शक्तियों का बँटवारा
भारत के संविधान में तीन सूचियाँ (Lists) बनाई गईं:
संघ सूची (Union List) – रक्षा, विदेश नीति, बैंकिंग आदि → सिर्फ केंद्र कानून बना सकता है।
राज्य सूची (State List) – पुलिस, कृषि, सिंचाई आदि → सिर्फ राज्य कानून बना सकते हैं।
समवर्ती सूची (Concurrent List) – शिक्षा, विवाह, वन आदि → केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन टकराव की स्थिति में केंद्र का कानून मान्य होगा।
अवशिष्ट शक्तियां : जो विषय इन सूचियों में नहीं हैं, उन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को है।
भाषाई राज्य
आज़ादी के बाद राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया गया।
शुरुआत में नेताओं को डर था कि इससे देश टूट सकता है, लेकिन हुआ इसका उल्टा – प्रशासन आसान हो गया।
राज्यों का गठन केवल भाषा ही नहीं, बल्कि संस्कृति, भूगोल और जनजातीय विविधताओं को ध्यान में रखकर भी हुआ।
भारत की भाषा नीति
भारत में कोई राष्ट्रभाषा नहीं है।
हिंदी और अन्य 21 भाषाओं को संविधान ने अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया।
अंग्रेज़ी को भी राजकीय भाषा का दर्जा दिया गया, ताकि गैर-हिंदी भाषी राज्यों को परेशानी न हो।
इस लचीली नीति की वजह से भारत श्रीलंका जैसी भाषाई समस्या से बच पाया।
हिंदी को राजभाषा माना गया पर हिंदी सिर्फ 40% (लगभग) भारतीयों की मातृभाषा है इसलिए अन्य भाषाओं के संरक्षण के अनेक दूसरे उपाय किए गए।
अनुसूचित भाषाएँ— वो 22 भाषाएँ जिन्हें भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा गया है, अनुसूचित भाषाएँ कहते हैं।
केंद्र-राज्य संबंध
पहले लंबे समय तक केंद्र और राज्यों में एक ही पार्टी की सरकारें रहीं।
जब अलग-अलग पार्टियाँ आईं, तो केंद्र सरकार ने कई बार राज्यों की सरकारों को भंग किया, जो संघीय भावना के खिलाफ था।
1990 के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।
अब केंद्र राज्यों की स्वायत्तता का ज्यादा सम्मान करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्णय दिया कि केंद्र मनमाने ढंग से राज्य सरकारों को नहीं भंग कर सकता।
गठबंधन सरकार— एक से अधिक राजनीतिक दलों के द्वारा मिलकर बनाई गई सरकार को गठबंधन सरकार कहते हैं।
भारत में विकेंद्रीकरण
जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियां लेकर स्थानीय सरकारों को दी जाती हैं तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं।
भारत बहुत बड़ा देश है, इसलिए सिर्फ दो स्तर की सरकार से काम नहीं चल सकता।
इसीलिए 1992 में 73वां और 74वां संशोधन किया गया और स्थानीय सरकारों (पंचायत व नगरपालिकाओं) को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनाव अब नियमित रूप से होते हैं।
दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियाँ और महिलाएँ पंचायत में आरक्षण के जरिए प्रतिनिधित्व पाती हैं।
महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण प्रदान किया गया है।
1992 के पंचायती राज व्यवस्था के प्रमुख प्रावधान:
अब स्थानीय स्वशासी निकायों के चुनाव नियमित रूप से कराना संवैधानिक बाध्यता है।
निर्वाचित स्वशासी निकायों के सदस्य तथा पदाधिकारियों के पदों में अनूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं।
कम से कम एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
हर राज्य में पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराने के लिए ‘राज्य चुनाव आयोग’ नामक स्वतंत्र संस्था का गठन किया गया है।
राज्य सरकारों को अपने राजस्व और अधिकारों का कुछ हिस्सा इन स्थानीय स्वशासी निकायों को देना पड़ता है।
पंचायत व्यवस्था
ग्राम पंचायत – गाँव या गाँवों का समूह। मुखिया = सरपंच / प्रधान।
पंचायत समिति – कई ग्राम पंचायतों का समूह।
जिला परिषद – पूरे जिले की पंचायतों का समूह। प्रमुख = जिला परिषद अध्यक्ष।
मुख्य समस्याएँ – धन की कमी, जागरूकता की कमी, अधिकारियों की मनमानी, चुनावों में देरी।
नगरपालिकाएँ और नगर निगम
छोटे शहर → नगरपालिका।
बड़े शहर → नगर निगम।
इनके प्रमुख चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं।
नगर निगम का प्रमुख = मेयर।
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